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Rigveda / 4 / 46 / 4

रथं॒ हिर॑ण्यवन्धुर॒मिन्द्र॑वायू स्वध्व॒रम्। आ हि स्थाथो॑ दिवि॒स्पृश॑म् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 46 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : रथ॑म्। हिर॑ण्यऽवन्धुरम्। इन्द्र॑वायू॒ इति॑। सु॒ऽअ॒ध्व॒रम् आ। हि। स्थाथः॑। दि॒वि॒ऽस्पृश॑म् ॥४॥

पदार्थ : हे (इन्द्रवायू) वायु और बिजुली के सदृश शीघ्रकारी शिल्पविद्या के अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप दोनों (स्वध्वरम्) नहीं नष्ट हुई उत्तम क्रिया जिससे और (हिरण्यवन्धुरम्) सुवर्ण हैं बन्धन जिसमें उस (दिविस्पृशम्) आकाश में चलनेवाले (रथम्) सुन्दर वाहन को (हि) ही (आ, स्थाथः) आ स्थित होओ ॥४॥

भावार्थ : हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप लोग प्रीति से सुवर्ण आदि से जड़े हुए वाहनों की विद्या का मनुष्यों के लिये निरन्तर उपदेश देओ कि जिन वाहनों से ये लोग अन्तरिक्ष आदिकों में जा सकें ॥४॥