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Rigveda / 4 / 47 / 4

या वां॒ सन्ति॑ पुरु॒स्पृहो॑ नि॒युतो॑ दा॒शुषे॑ नरा। अ॒स्मे ता य॑ज्ञवाह॒सेन्द्र॑वायू॒ नि य॑च्छतम् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 47 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : याः। वा॒म्। सन्ति। पु॒रु॒ऽस्पृहः॑। नि॒ऽयुतः॑। दा॒शुषे॑। न॒रा॒। अस्मे इति॑। ताः। य॒ज्ञ॒ऽवा॒ह॒सा॒। इन्द्र॑वायू॒ इति॑। नि। य॒च्छ॒त॒म् ॥४॥

पदार्थ : हे (यज्ञवाहसा) यज्ञ को प्राप्त करानेवाले (नरा) नायक (इन्द्रवायू) धनी और विद्वान् तथा राजा और मन्त्री जनो ! (वाम्) आप दोनों की (याः) जो (नियुतः) निश्चित (पुरुस्पृहः) बहुतों से ईप्सा करने योग्य क्रिया (दाशुषे) दाता जन के लिये (सन्ति) हैं (ताः) उन क्रियाओं को (अस्मे) हम लोगों के लिये (नि, यच्छतम्) अतिशय करके दीजिये ॥४॥

भावार्थ : हे राजा और मन्त्री जनो ! आप लोगों को चाहिये कि हम प्रजा जनों की इच्छा पूर्ण करें, जिससे हम लोग आप लोगों का पूर्ण काम करें ॥४॥ इस सूक्त में विद्वान् राजा और अमात्य के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥४॥ यह सैंतालीसवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥