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Rigveda / 4 / 48 / 4

वह॑न्तु त्वा मनो॒युजो॑ यु॒क्तासो॑ नव॒तिर्नव॑। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 48 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : वायु: | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वह॑न्तु। त्वा। म॒नः॒ऽयुजः॑। यु॒क्तासः॑। न॒व॒तिः। नव॑। वायो॒ इति॑। आ। च॒न्द्रेण॑। रथे॑न। या॒हि। सु॒तस्य॑। पी॒तये॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (वायो) बलवान् राजन् ! (मनोयुजः) मन से ब्रह्म का योग करनेवाले (युक्तासः) जिन्होंने योगाभ्यास किया वे (नव) नौ वार गुनी गईं (नवतिः) नव्वे संख्या से युक्त नाड़ियों के सदृश (त्वा) आप राजा को (वहन्तु) प्राप्त हों वा प्राप्त करावें आप इनके (सुतस्य) प्राप्त राज्य के (पीतये) रक्षण आदि के लिये (चन्द्रेण) सुवर्ण आदि से बने हुए (रथेन) वाहन से (आ, याहि) आइये ॥४॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो श्रेष्ठ यथार्थवक्ता जन आपके सहायक होवें तो आप जिस-जिस पदार्थ की इच्छा करें, वह-वह सब सिद्ध होवें ॥४॥