Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 50 / 5

स सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण। बृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द्वाव॑शती॒रुदा॑जत् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 50 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। सु॒ऽस्तुभा॑। सः। ऋक्व॑ता। ग॒णेन॑। व॒लम्। रु॒रो॒ज॒। फ॒लि॒ऽगम्। रवे॑ण। बृह॒स्पतिः॑। उ॒स्रियाः॑। ह॒व्य॒ऽसूदः॑। कनि॑क्रदत्। वाव॑शतीः। उत्। आ॒ज॒त् ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जैसे (सः) वह (हव्यसूदः) हवन करने योग्य पदार्थों को क्षरण कराने अर्थात् अपने प्रताप से अणुरूप करानेवाला (कनिक्रदत्) अत्यन्त शब्द करता हुआ (बृहस्पतिः) बड़ा और सब का पालन करनेवाला सूर्य्य (सुष्टुभा) सुन्दर प्रशंसित (गणेन) किरणसमूह से (फलिगम्) मेघ को (रुरोज) भङ्ग करे और (सः) वह विद्वान् (ऋक्वता) बहुत प्रशंसायुक्त उपदेश देने योग्य विद्यार्थियों के समूह से (रवेण) शब्द से (वलम्) कुटिल चाल को भङ्ग करे और (उस्रियाः) पृथिवी के बीच वर्त्तमान (वावशतीः) अत्यन्त कामना करती हुई प्रजाओं को (उत्, आजत्) प्राप्त होता है, वैसे आप वर्त्ताव करो ॥५॥

भावार्थ : जैसे सूर्य्य वृष्टि के द्वारा सब प्रजाओं की रक्षा करता और बिजुली के शब्द से सब को जनाता है, वैसे ही सब विद्वान् जन विद्या के द्वारा सब के द्वारा सब के आत्माओं को प्रकाशित करें ॥५॥