Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 50 / 10

इन्द्र॑श्च॒ सोमं॑ पिबतं बृहस्पते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे म॑न्दसा॒ना वृ॑षण्वसू। आ वां॑ विश॒न्त्विन्द॑वः स्वा॒भुवो॒ऽस्मे र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छतम् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 50 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्राबृहस्पती | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब राजा कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रः॑। च॒। सोम॑म्। पि॒ब॒त॒म्। बृ॒ह॒स्प॒ते॒। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। म॒न्द॒सा॒ना। वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृष॒ण्व॒सू। आ। वा॒म्। वि॒श॒न्तु॒। इन्द॑वः। सु॒ऽआ॒भुवः॑। अ॒स्मे इति॑। र॒यिम्। सर्व॑ऽवीरम्। नि। य॒च्छ॒त॒म् ॥१०॥

पदार्थ : हे (बृहस्पते) पूर्णविद्वन् ! (च) और (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाला (मन्दसाना) प्रशंसित और आनन्दयुक्त (वृषण्वसू) बलिष्ठ वीर पुरुषों को निवास करानेवाले आप दोनों (अस्मिन्) इस (यज्ञे) राज्यपालननामक व्यवहार में (सोमम्) उत्तम ओषधियों के रस का (पिबतम्) पान करो और जैसे (स्वाभुवः) आप होनेवाले (इन्दवः) ऐश्वर्य्य (वाम्) आप दोनों को (आ, विशन्तु) प्राप्त हों, वैसे (अस्मे) हम लोगों के लिये (सर्ववीरम्) सब वीर हों जिससे उस (रयिम्) धन को आप दोनों (नि, यच्छतम्) उत्तम प्रकार दीजिये ॥१०॥

भावार्थ : हे राजा और राजोपदेशको ! तुम कभी मदकारक वस्तु का सेवन न करो और राज्यपालन तथा सत्योपदेश से ही प्रजाओं का पालन कर सदैव आनन्दित होओ और हम लोगों के लिये सब ऐश्वर्य्य अच्छे प्रकार देओ १०॥ ॥