Rigveda / 4 / 51 / 3
उ॒च्छन्ती॑र॒द्य चि॑तयन्त भो॒जान्रा॑धो॒देया॑यो॒षसो॑ म॒घोनीः॑। अ॒चि॒त्रे अ॒न्तः प॒णयः॑ सस॒न्त्वबु॑ध्यमाना॒स्तम॑सो॒ विम॑ध्ये ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 51 | Mantra No : 3
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : uShaaH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : uchChantiiradya chitayanta bhojaanraadhodeyaayoShaso maghoniiH. achitre antaH paNayaH sasantvabudhyamaanaastamaso vimadhye .3.
Component Words : uchChantiiH. adya. chitayanta. bhojaan. raadhaH.adeyaaya. uShasaH. maghoniiH. achitre. antariti. paNayaH. sasantu. abudhyamaanaaH. tamasaH. vi.amadhye .3.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : उ॒च्छन्तीः॑। अ॒द्य। चि॒त॒य॒न्त॒। भो॒जान्। रा॒धः॒ऽदेया॑य। उ॒षसः॑। म॒घोनीः॑। अ॒चि॒त्रे। अ॒न्तरिति॑। प॒णयः॑। स॒स॒न्तु॒। अबु॑ध्यमानाः। तम॑सः। विऽम॑ध्ये ॥३॥
पदार्थ : हे विद्वानो ! जो (तमसः) रात्रि के (अचित्रे) नहीं आश्चर्य जिसमें ऐसे (विमध्ये) विशेष अन्धकार में (उषसः) प्रातर्वेलाओं के सदृश (मघोनीः) सत्कार किया धन का जिन्होंने उनकी स्त्रियाँ (उच्छन्तीः) और उत्तम प्रकार वास देती हुई (अन्तः) मध्य में (अबुध्यमानाः) बोधरहित (पणयः) प्रशंसा करने योग्य स्त्रियाँ (ससन्तु) सुख से सोवें और (राधोदेयाय) धन देने योग्य व्यवहार के लिये (भोजान्) पालन करनेवाले पतियों को (अद्य) आज (चितयन्त) जनाती हैं, वे अच्छे प्रकार ग्रहण करनी चाहिये ॥३॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे पुरुषो ! जो कन्या अपने सदृश विदुषी और शुभ गुण, कर्म, स्वभाववाली होवें, वे ही स्त्री होने के लिये स्वीकार करने योग्य हैं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : उ॒च्छन्तीः॑। अ॒द्य। चि॒त॒य॒न्त॒। भो॒जान्। रा॒धः॒ऽदेया॑य। उ॒षसः॑। म॒घोनीः॑। अ॒चि॒त्रे। अ॒न्तरिति॑। प॒णयः॑। स॒स॒न्तु॒। अबु॑ध्यमानाः। तम॑सः। विऽम॑ध्ये ॥३॥
पदार्थ : (उच्छन्तीः) सुवासयन्त्यः (अद्य) (चितयन्त) विज्ञापयन्ति (भोजान्) पालकान् पतीन् (राधोदेयाय) धनं दातुं योग्याय व्यवहाराय (उषसः) प्रातर्वेला इव (मघोनीः) सत्कृतधनानां स्त्रियः (अचित्रे) अनाश्चर्ये (अन्तः) मध्ये (पणयः) प्रशंसनीयाः (ससन्तु) शयीरन् (अबुध्यमानाः) बोधरहिताः (तमसः) रात्रेः (विमध्ये) विशेषान्धकारे ॥३॥
अन्वय : हे विद्वांसो ! या तमसोऽचित्रे विमध्य उषस इव मघोनीरुच्छन्तीरन्तोऽबुध्यमानाः पणयः स्त्रियः सुखेन ससन्तु राधोदेयाय भोजानद्य चितयन्त ता सङ्ग्रहीतव्याः ॥३॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे पुरुषा ! याः कन्याः स्वसदृश्यो विदुष्यः शुभगुणकर्मस्वभावाः स्युस्ता एव भार्य्यत्वायाङ्गीकार्याः ॥३॥