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Rigveda / 4 / 55 / 4

व्य॑र्य॒मा वरु॑णश्चेति॒ पन्था॑मि॒षस्पतिः॑ सुवि॒तं गा॒तुम॒ग्निः। इन्द्रा॑विष्णू नृ॒वदु॒ षु स्तवा॑ना॒ शर्म॑ नो यन्त॒मम॑व॒द्वरू॑थम् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 55 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। अ॒र्य॒मा। वरु॑णः। चे॒ति॒। पन्था॑म्। इ॒षः। पतिः॑। सु॒वि॒तम्। गा॒तुम्। अ॒ग्निः। इन्द्रा॑विष्णू इति॑। नृ॒ऽवत्। ऊ॒म् इति॑। सु। स्तवा॑ना। शर्म॑। नः। य॒न्तम्। अम॑ऽवत्। वरू॑थम् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अर्यमा) न्यायकर्त्ता और (वरुणः) श्रेष्ठ पुरुष (पन्थाम्) धर्मसम्बन्धी मार्ग को (वि, चेति) विशेष कर जानता है (गातुम्) पृथिवी को (अग्निः) अग्नि जैसे वैसे वर्त्तमान (इषः) अन्न आदि का (पतिः) स्वामी (सुवितम्) उत्तम प्रकार उत्पन्न किये गये को विशेषकर जानता है। और हे अध्यापकोपदेशको आप दोनों (इन्द्राविष्णू) बिजुली और वायु के सदृश (स्तवाना) सत्य की प्रशंसा करने वालो ! (नृवत्) प्रधान पुरुष के सदृश (उ) और (नः) हम लोगों के (अमवत्) प्रशस्तरूप से युक्त (शर्म) सुख और (वरूथम्) गृह को (सु, यन्तम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे न्यायकारी विद्वान् लोग अधर्म्मसम्बन्धी मार्ग का त्याग करके धर्मसम्बन्धी मार्ग में चलते हैं, वैसे आप लोग भी चलें ॥४॥