Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 56 / 4

नू रो॑दसी बृ॒हद्भि॑र्नो॒ वरू॑थैः॒ पत्नी॑वद्भिरि॒षय॑न्ती स॒जोषाः॑। उ॒रू॒ची विश्वे॑ यज॒ते नि पा॑तं धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 56 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : द्यावापृथिव्यौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। रो॒द॒सी॒ इति॑। बृ॒हत्ऽभिः॑। नः॒। वरू॑थैः। पत्नी॑वत्ऽभिः। इ॒षय॑न्ती॒ इति॑। स॒ऽजोषाः॑। उ॒रू॒ची इति॑। विश्वे॒ इति॑। य॒ज॒ते इति॑। नि। पा॒त॒म्। धि॒या। स्या॒म॒। र॒थ्यः॑। स॒दा॒ऽसाः ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (सजोषाः) तुल्य प्रीति का सेवन करनेवाला विद्वान् (धिया) बुद्धि वा कर्म्म से जो (इषयन्ती) सुख को प्राप्त कराती हुईं (उरूची) बहुतों का आदर करनेवाली (विश्वे) अन्तरिक्ष में प्रविष्ट (यजते) मिलने योग्य और (बृहद्भिः) जो बड़े (पत्नीवद्भिः) बहुत स्त्रियों से युक्त (वरूथैः) उत्तम गृह उनके साथ वर्त्तमान (रोदसी) सूर्य्य और पृथिवी (नः) हम लोगों की (नि) अत्यन्त (पातम्) रक्षा करती हैं उनको जानता है, वैसे इनको जान के हम लोग (रथ्यः) बहुत रथ आदि से युक्त (सदासाः) सेवकों के सहित (नू) शीघ्र (स्याम) होवें ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य बहुत और बड़े पदार्थों से युक्त बिजुली और भूमि को विशेष करके जानते हैं, वे शीघ्र लक्ष्मीवान् होते हैं ॥४॥