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Rigveda / 5 / 1 / 1

अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमि॑वाय॒तीमु॒षास॑म्। य॒ह्वाइ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑नाः॒ प्र भा॒नवः॑ सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 1 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : बुद्धगविष्ठरावात्रेयी | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब बारह ऋचावाले प्रथम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में उपदेश देने योग्य और उपदेश देनेवाले के गुणों को कहते हैं ॥१॥

पदपाठ : अबो॑धि। अ॒ग्निः। स॒म्ऽइधा॑। जना॑नाम्। प्रति॑। धे॒नुम्ऽइ॑व। आ॒ऽय॒तीम्। उ॒षास॑म्। य॒ह्वाःऽइ॑व। प्र। व॒याम्। उ॒त्ऽजिहा॑नाः। प्र। भा॒नवः॑। सि॒स्र॒ते॒। नाक॑म्। अच्छ॑ ॥१॥

पदार्थ : हे विद्वन्! जैसे (समिधा) ईन्धन और घृत आदि से (अग्निः) अग्नि (अबोधि) जाना जाता अर्थात् प्रज्वलित किया जाता है (भानवः) कान्तियें (जनानाम्) मनुष्यों की (आयतीम्) आती हुई (धेनुमिव) दुग्ध देनेवाली गौ के तुल्य (उषासम्) प्रातर्वेला के (प्रति) (प्र, सिस्रते) प्राप्त होती और (वयाम्) शाखा को (प्र, उज्जिहानाः) अच्छे प्रकार त्यागते हुए (यह्वा इव) बड़े वृक्षों के सदृश (नाकम्) दुःख से रहित अन्तरिक्ष को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त होती है, वैसे आप हूजिये ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्न्यादि पदार्थों की विद्या को ग्रहण कर कार्य्यों में अच्छे प्रकार युक्त करते हैं, वे दुःखरहित हुए वृक्षों के समान बढ़ते हैं ॥१॥