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Rigveda / 5 / 3 / 2

त्वम॑र्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑ स्वधाव॒न्गुह्यं॑ बिभर्षि। अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न गोभि॒र्यद्दम्प॑ती॒ सम॑नसा कृ॒णोषि॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 3 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। अ॒र्य॒मा। भ॒व॒सि॒। यत्। क॒नीना॑म्। नाम॑। स्व॒धा॒ऽव॒न्। गुह्य॑म्। बि॒भ॒र्षि॒। अ॒ञ्जन्ति॑। मि॒त्रम्। सुऽधि॑तम्। न। गोभिः॑। यत्। दम्प॑ती॒ इति॒ दम्ऽप॑ती। सऽम॑नसा। कृ॒णोषि॑ ॥२॥

पदार्थ : हे (स्वधावन्) अच्छे अन्न से युक्त राजन् ! (यत्) जिससे (त्वम्) आप (कनीनाम्) कामना करनेवालों के (अर्यमा) न्यायाधीश (भवसि) होते हो और (गुह्यम्) गुप्त (नाम) नाम को (बिभर्षि) धारण करते हो और (यत्) जो (दम्पती) विवाहित स्त्री पुरुषों को (समनसा) तुल्य मन और दृढ़ प्रीतियुक्त (कृणोषि) करते हो उन आप को सम्पूर्ण विद्वान् जन (गोभिः) वाणी आदि पदार्थों से (सुधितम्) सुन्दर प्रसन्न (मित्रम्) मित्र के (न) सदृश (अञ्जन्ति) प्रकट करते हैं ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही राजा श्रेष्ठ है, जो प्रजाओं का यथार्थ न्याय करता है और जैसे मित्र मित्र को प्रसन्न करता है, वैसे ही राजा प्रजाओं को प्रसन्न करे ॥२॥