Rigveda / 1 / 31 / 17
म॒नु॒ष्वद॑ग्ने अङ्गिर॒स्वद॑ङ्गिरो ययाति॒वत्सद॑ने पूर्व॒वच्छु॑चे। अच्छ॑ या॒ह्या व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॒मा सा॑दय ब॒र्हिषि॒ यक्षि॑ च प्रि॒यम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 31 | Mantra No : 17
In English:
Seer : hiraNyastuupa aa~NgirasaH | Devta : agniH | Metre : viraaDjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : manuShvadagne a~Ngirasvada~Ngiro yayaativatsadane puurvavachChuche. achCha yaahyaa vahaa daivya.m janamaa saadaya barhiShi yakShi cha priyam .
Component Words : manuShvat. agne. a~Ngirasvat. a~NgiraH. yayaati.avat. sadane. puurva.avat. shuche. achCha. yaahi. aa. vaha. daivyam. janam. aa. saadaya. barhiShi. yakShi. cha. priyam .
In Hindi:
ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदपाठ : म॒नु॒ष्वत्। अ॒ग्ने॒। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अ॒ङ्गि॒रः॒। य॒या॒ति॒ऽवत्। सद॑ने। पू॒र्व॒ऽवत्। शु॒चे॒। अच्छ॑। या॒हि॒। आ। व॒ह॒। दैव्य॑म्। जन॑म्। आ। सा॒द॒य॒। ब॒र्हिषि॑। यक्षि॑। च॒। प्रि॒यम् ॥
पदार्थ : हे (शुचे) पवित्र (अङ्गिरः) प्राण के समान धारण करनेवाले (अग्ने) विद्याओं से सर्वत्र व्याप्त सभाध्यक्ष ! आप (मनुष्वत्) मनुष्यों के जाने-आने के समान वा (अङ्गिरस्वत्) शरीरव्याप्त प्राणवायु के सदृश राज्यकर्म व्याप्त पुरुष के तुल्य वा (ययातिवत्) जैसे पुरुष यत्न के साथ कामों को सिद्ध करते कराते हैं वा (पूर्ववत्) जैसे उत्तम प्रतिष्ठावाले विद्वान् विद्या देनेवाले हैं, वैसे (प्रियम्) सबको प्रसन्न करनेहारे (दैव्यम्) विद्वानों में अति चतुर (जनम्) मनुष्य को (अच्छ) अच्छे प्रकार (आयाहि) प्राप्त हूजिये, उस मनुष्य को विद्या और धर्म की ओर (वह) प्राप्त कीजिये तथा (बर्हिषि) (सदने) उत्तम मोक्ष के साधन में (आसादय) स्थित और (यक्षि) वहाँ उसको प्रतिष्ठित कीजिये ॥ १७ ॥
भावार्थ : जिन मनुष्यों ने विद्या धर्मानुष्ठान और प्रेम से सभापति की सेवा की है, वह उनको उत्तम-उत्तम धर्म के कामों में लगाता है ॥ १७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनः स एवोपदिश्यते ॥
पदपाठ : म॒नु॒ष्वत्। अ॒ग्ने॒। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अ॒ङ्गि॒रः॒। य॒या॒ति॒ऽवत्। सद॑ने। पू॒र्व॒ऽवत्। शु॒चे॒। अच्छ॑। या॒हि॒। आ। व॒ह॒। दैव्य॑म्। जन॑म्। आ। सा॒द॒य॒। ब॒र्हिषि॑। यक्षि॑। च॒। प्रि॒यम् ॥
पदार्थ : (मनुष्वत्) यथा मनुष्या गच्छन्ति तद्वत् (अग्ने) सर्वाभिगन्तः सभेश ! (अङ्गिरस्वत्) यथा शरीरे प्राणा गच्छन्त्यागच्छन्ति तद्वत् (अङ्गिरः) पृथिव्यादीनामङ्गानां प्राणवद्धारक ! (ययातिवत्) यथा प्रयत्नवन्तः पुरुषाः कर्माणि प्राप्नुवन्ति प्रापयन्ति च तद्वत्। अत्र यती प्रयत्न इत्यस्मादौणादिक इन् प्रत्ययः स च बाहुलकाण्णित् सन्वच्च। इदं सायणाचार्य्येण भूतपूर्वस्य कस्यचिद् ययाते राज्ञः कथासम्बन्धे व्याख्यातं तदनजर्यम् (सदने) सीदन्ति जना यस्मिंस्तस्मिन् (पूर्ववत्) यथा पूर्वे विद्वांसो विद्यादानार्थं गच्छन्त्यागच्छन्ति तद्वत् (शुचे) पवित्रकारक (अच्छ) श्रेष्ठार्थे (याहि) प्राप्नुहि (आ) समन्तात् (वह) प्रापय । अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (दैव्यम्) देवेषु विद्वत्सु कुशलस्तम् (जनम्) मनुष्यम् (आ) आभिमुख्ये (सादय) अवस्थापय (बर्हिषि) उत्तमे मोक्षपदेऽन्तरिक्षे वा (यक्षि) याजय वा। अत्र सामान्यकाले लुङडभावश्च। (च) (प्रियम्) सर्वाञ्जनान् प्रीणन्तम् ॥ १७ ॥
अन्वय : हे शुचेऽङ्गिरोऽग्ने सभापते ! त्वं विनयायाभ्यां मनुष्वदङ्गिरस्वद्ययातिवत्पूर्ववत् प्रियं दैव्यं जनमच्छायाहि तं च विद्याधर्मं प्रति वह प्रापय बर्हिष्यासादय सदने यक्षि याजय च ॥ १७ ॥
भावार्थ : यैर्मनुष्यैर्विद्यया धर्मानुष्ठानेन प्रेम्णा सेवितः सभापतिः स तानुत्तमेषु धर्म्येषु व्यवहारेषु प्रेरयति ॥ १७ ॥