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Rigveda / 5 / 4 / 4

जु॒षस्वा॑ग्न॒ इळ॑या स॒जोषा॒ यत॑मानो र॒श्मिभिः॒ सूर्य॑स्य। जु॒षस्व॑ नः स॒मिधं॑ जातवेद॒ आ च॑ दे॒वान्ह॑वि॒रद्या॑य वक्षि ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 4 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : जु॒षस्व॑। अ॒ग्ने॒। इळ॑या। स॒ऽजोषाः॑। यत॑मानः। र॒श्मिऽभिः॑। सूर्य॑स्य। जु॒षस्व॑। नः। स॒म्ऽइध॑म्। जा॒त॒ऽवे॒दः॒। आ। च॒। दे॒वान्। ह॒विः॒ऽअद्या॑य। व॒क्षि॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (जातवेदः) ज्ञान की उत्पत्ति से विशिष्ट (अग्ने) दुष्टों के नाश करनेवाले (यतमानः) प्रयत्न करते हुए (सजोषाः) तुल्य प्रीति सेवन करनेवाले आप (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (रश्मिभिः) किरणों के सदृश (इळया) प्रशंसित वाणी से (नः) हम लोगों के (समिधम्) काष्ठ के तुल्य शत्रु की (जुषस्व) सेवा करो और (हविरद्याय) खाने योग्य पदार्थ के लिये (देवान्) विद्वानों को (आ, वक्षि) प्राप्त कराते अर्थात् पहुँचाते हो उनकी (च) और (जुषस्व) सेवा करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सब जीवों के करने योग्य कर्म्म सिद्ध होते हैं, वैसे ही यथार्थवक्ता पुरुषों से राजा के सर्व न्याययुक्त प्रजापालन आदि कर्म्म होते हैं ॥४॥