Rigveda / 5 / 5 / 2
नरा॒शंसः॑ सुषूदती॒मं य॒ज्ञमदा॑भ्यः। क॒विर्हि मधु॑हस्त्यः ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vasushruta aatreyaH | Devta : aapriyaH | Metre : aarchyuShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : naraasha.msaH suShuudatiima.m yaj~namadaabhyaH. kavirhi madhuhastyaH .2.
Component Words : naraasha.msaH. susuudati. imam. yaj~nam. adaabhyaH. kaviH. hi. madhu.ahastyaH .2.
In Hindi:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : नरा॒शंसः॑। सु॒सू॒द॒ति॒। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। अदा॑भ्यः। क॒विः। हि। मधु॑ऽहस्त्यः ॥२॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अदाभ्यः) निष्कपट (मधुहस्त्यः) मधुर हस्तवालों में श्रेष्ठ (नराशंसः) मनुष्यों से प्रशंसा किया गया (कविः) बुद्धिमान् जन (हि) जिस कारण (इमम्) इस (यज्ञम्) विद्या के प्रचारनामक व्यवहार को (सुषूदति) अमृत के सदृश टपकाता है, इस कारण वह पूर्ण सुखयुक्त होता है ॥२॥
भावार्थ : हे विद्वान् ! जैसे गौ सब के सुख के लिये दुग्ध देती है, वैसे सब के सुख के लिये सत्यविद्या के उपदेशों को निरन्तर वर्षाइये ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : नरा॒शंसः॑। सु॒सू॒द॒ति॒। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। अदा॑भ्यः। क॒विः। हि। मधु॑ऽहस्त्यः ॥२॥
पदार्थ : (नराशंसः) यो नरैः प्रशस्यते (सुषूदति) अमृतं क्षरति (इमम्) (यज्ञम्) विद्याप्रचाराख्यं व्यवहारम् (अदाभ्यः) निष्कपटः (कविः) मेधावी (हि) यतः (मधुहस्त्यः) मधुहस्तेषु साधुः ॥२॥
अन्वय : हे मनुष्या ! योऽदाभ्यो मधुहस्त्यो नराशंसः कविर्जनो हीमं यज्ञं सुषूदत्यतः सोऽलंसुखो जायते ॥२॥
भावार्थ : हे विद्वन् ! यथा गौः सर्वेषां सुखाय दुग्धं क्षरति तथा सर्वेषां सुखाय सत्यविद्योपदेशान् सततं वर्षय ॥२॥