Rigveda / 5 / 5 / 10
यत्र॒ वेत्थ॑ वनस्पते दे॒वानां॒ गुह्या॒ नामा॑नि। तत्र॑ ह॒व्यानि॑ गामय ॥१०॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vasushruta aatreyaH | Devta : aapriyaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yatra vettha vanaspate devaanaa.m guhyaa naamaani. tatra havyaani gaamaya .10.
Component Words : yatra. vettha. vanaspate. devaanaam. guhyaa. naamaani. tatra. havyaani. gamaya .10.
In Hindi:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब विद्याग्रहणविषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यत्र॑। वेत्थ॑। व॒न॒स्प॒ते॒। दे॒वाना॑म्। गुह्या॑। नामा॑नि। तत्र॑। ह॒व्यानि॑। ग॒म॒य॒ ॥१०॥
पदार्थ : हे (वनस्पते) वन के पालन करनेवाले आप (यत्र) जिसमें (देवानाम्) विद्वानों के (गुह्या) गुप्त (नामानि) नाम (वेत्थ) जानते हैं (तत्र) वहाँ (हव्यानि) देने और लेने योग्य वस्तुओं को (गामय) पहुँचाइये ॥१०॥
भावार्थ : जो विद्वानों के हृदयों में स्थित और विद्या के प्रभाव से उत्पन्न हुए नामों को जानते हैं, वे बहुत सुख मनुष्यों को प्राप्त कराते हैं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ विद्याग्रहणविषयमाह ॥
पदपाठ : यत्र॑। वेत्थ॑। व॒न॒स्प॒ते॒। दे॒वाना॑म्। गुह्या॑। नामा॑नि। तत्र॑। ह॒व्यानि॑। ग॒म॒य॒ ॥१०॥
पदार्थ : (यत्र) अस्मिन् (वेत्थ) जानासि (वनस्पते) वनस्य पालक (देवानाम्) (गुह्या) गुप्तानि (नामानि) (तत्र) (हव्यानि) दातुमादातुमर्हाणि वस्तूनि (गामय) प्रापय। अत्र तुजादीनामिति दीर्घः ॥१०॥
अन्वय : हे वनस्पते ! त्वं यत्र देवानां गुह्या नामानि वेत्थ तत्र हव्यानि गामय ॥१०॥
भावार्थ : ये विदुषामन्तःस्थानि विद्याप्रभावेन जातानि नामानि जानन्ति ते पुष्कलं सुखं जनान् प्रापयन्ति ॥१०॥