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Rigveda / 5 / 6 / 2

सो अ॒ग्निर्यो वसु॑र्गृ॒णे सं यमा॒यन्ति॑ धे॒नवः॑। समर्व॑न्तो रघु॒द्रुवः॒ सं सु॑जा॒तासः॑ सू॒रय॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 6 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। अ॒ग्निः। यः। वसुः॑। गृ॒णे। सम्। यम्। आ॒ऽयन्ति॑। धे॒नवः॑। सम्। अर्व॑न्तः। र॒घु॒ऽद्रुवः॑। सम्। सु॒ऽजा॒ता॑सः। सू॒रयः॑। इष॑म्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥२॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (यः) जो (वसुः) धनरूप (यम्) जिसको (धेनवः) वाणियाँ (सम्, आयन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं और जिसको (रघुद्रुवः) थोड़ा दौड़नेवाले (अर्वन्तः) वेगवान् पदार्थ (सम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं और जिसको (सुजातासः) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध (सूरयः) विद्वान् जन (सम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं और जिसकी मैं (गृणे) प्रशंसा करता हूँ (सः) वह (अग्निः) अग्नि है, उसके प्रयोग से (स्तोतृभ्यः) अध्यापकों के लिये (इषम्) अन्न को (आ, भर) सब प्रकार धारण कीजिये ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोग अग्नि आदि पदार्थ के विज्ञान से चतुर होकर अध्यापकों के लिये ऐश्वर्य्य की प्राप्ति कराइये ॥२॥