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Rigveda / 5 / 6 / 6

प्रो त्ये अ॒ग्नयो॒ऽग्निषु॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म्। ते हि॑न्विरे॒ त इ॑न्विरे॒ त इ॑षण्यन्त्यानु॒षगिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 6 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्रो इति॑। त्ये। अ॒ग्नयः॑। अ॒ग्निषु॑। विश्व॑म्। पु॒ष्य॒न्ति॒। वार्य॑म्। ते। हि॒न्वि॒रे॒। ते। इ॒न्वि॒रे॒। ते। इ॒ष॒ण्य॒न्ति॒। आ॒नु॒षक्। इष॑म्। स्तो॒तृऽभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अग्नयः) अग्नि (अग्निषु) अग्नि आदि पदार्थों में वर्त्तमान हैं (त्ये) वे (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य (विश्वम्) सब जगत् को (प्रो, पुष्यन्ति) पुष्ट करते हैं (ते) वे स्वीकार करने योग्य पदार्थ की (हिन्विरे) वृद्धि कराते हैं (ते) वे (इन्विरे) व्याप्त होते हैं और (ते) वे कार्य्यों के सिद्ध करनेवाले हैं, उनको जान के जो (आनुषक्) अनुकूलता से (इषण्यन्ति) अन्न आदि की इच्छा करते हैं, उनकी विद्या से (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये आप (इषम्) विज्ञान को (आ, भर) धारण कीजिये ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो पृथिवी आदि में अग्नि आदि पदार्थ हैं, उनको जान के फिर ईश्वर को जानो ॥६॥