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Rigveda / 5 / 7 / 7

स हि ष्मा॒ धन्वाक्षि॑तं॒ दाता॒ न दात्या प॒शुः। हिरि॑श्मश्रुः॒ शुचि॑दन्नृ॒भुरनि॑भृष्टतविषिः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 7 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : इष आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अब राजविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। हि। स्म॒। धन्व॑। आऽक्षि॑तम्। दाता॑। न। दाति॑। आ। प॒शुः। हिरि॑ऽश्मश्रुः॒। शुचि॑ऽदन्। ऋ॒भुः। अनि॑भृष्टऽतविषिः ॥७॥

पदार्थ : जो (हिरिश्मश्रुः) सुवर्ण के तुल्य दाढ़ी और (शुचिदन्) पवित्र दाँतों से युक्त (अनिभृष्टतविषिः) नहीं जली सेना जिसकी ऐसा (ऋभुः) मेधावी (दाता) [देनेवाला] (पशुः) पशु (न) जैसे (धन्व) अन्तरिक्ष जो (आक्षितम्) सब ओर से अविनाशी उसको वैसे दुष्टों को (आ, दाति) ग्रहण करता है (सः, हि, स्मा) यही निश्चित सुखपूर्वक बढ़ता है ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे नहीं देनेवाला धान्य को कटवा कर भूसे को अलग करके अन्न का ग्रहण करता है और जैसे पशु खुरों से धान्य आदि को तोड़ता है, वैसे ही राजा साहस करनेवाले दुष्ट मनुष्यों का निरन्तर ताड़न करे ॥७॥