Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 9 / 2

अ॒ग्निर्होता॒ दास्व॑तः॒ क्षय॑स्य वृ॒क्तब॑र्हिषः। यं य॒ज्ञास॒श्चर॑न्ति॒ यं सं वाजा॑सः श्रव॒स्यवः॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 9 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गय आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निः। होता॑। दास्व॑तः। क्षय॑स्य। वृ॒क्तऽब॑र्हिषः। सम्। य॒ज्ञासः॑। चर॑न्ति। यम्। सम्। वाजा॑सः। श्रव॒स्यवः॑ ॥२॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! जैसे (होता) दाता (अग्निः) अग्नि के सदृश पुरुष (दास्वतः) देनेवाले के स्वभाव से युक्त (वृक्तबर्हिषः) जल से रहित (क्षयस्य) स्थान के मध्य में बसता है, वैसे (यम्) जिसको (श्रवस्यवः) अपने धन की इच्छा करनेवाले (वाजासः) वेग से युक्त (यज्ञासः) मिलने योग्य जन (सम्, चरन्ति) उत्तम प्रकार संचार करते हैं, वह (सम्) उत्तम प्रकार जनानेवाला होता है ॥२॥

भावार्थ : मनुष्य बड़े अवकाशवाले गृहों को रच के पुरुषार्थ से पदार्थविद्या को प्राप्त हों ॥२॥