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Rigveda / 5 / 10 / 5

तव॒ त्ये अ॑ग्ने अ॒र्चयो॒ भ्राज॑न्तो यन्ति धृष्णु॒या। परि॑ज्मानो॒ न वि॒द्युतः॑ स्वा॒नो रथो॒ न वा॑ज॒युः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 10 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गय आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब शिल्पविद्यविषयक विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : तव॑। त्ये। अ॒ग्ने॒। अ॒र्चयः॑। भ्राज॑न्तः। य॒न्ति॒। धृ॒ष्णु॒ऽया। परि॑ऽज्मानः। न। वि॒ऽद्युतः॑। स्वा॒नः। रथः॑। न। वा॒ज॒ऽयुः ॥५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! (तव) आपके सङ्ग से जो (अर्चयः) विद्या और विनय से प्रकाशित (भ्राजन्तः) परस्पर एक-दूसरे को प्रकाशित करते हुए (धृष्णुया) न्यायपूर्वक बोलने में ढीठ विद्वान् जन (परिज्मानः) सब ओर से भूमि के राज्य से युक्त (विद्युतः) बिजुलियों के (न) सदृश (वाजयुः) अपने वेग की इच्छा करनेवाले के सदृश और (स्वानः) शब्द करते हुए (रथः) विमान आदि वाहनसमूह के (न) सदृश शिल्पविद्या को (यन्ति) प्राप्त होते हैं (त्ये) वे शीघ्र धनवान् होते हैं ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो जन यथार्थ शिल्पविद्या को जानते हैं, वे सर्वत्र व्याप्त बिजुली के समान विमान आदि वाहनों के सदृश शीघ्रगामी हो और सब प्रकार से धन को प्राप्त होकर बहुत सुख को प्राप्त होते हैं ॥५॥