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Rigveda / 5 / 10 / 7

त्वं नो॑ अग्ने अङ्गिरः स्तु॒तः स्तवा॑न॒ आ भ॑र। होत॑र्विभ्वा॒सहं॑ र॒यिं स्तो॒तृभ्यः॒ स्तव॑से च न उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 10 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गय आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्यार्थिविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। अ॒ङ्गि॒रः॒। स्तु॒तः। स्तवा॑नः। आ। भ॒र॒। होतः॑। वि॒भ्व॒ऽसह॑म्। र॒यिम्। स्तो॒तृभ्यः॑। स्तव॑से। च॒। नः॒। उ॒त। ए॒धि॒। पृ॒त्ऽसु। नः॒। वृ॒धे ॥७॥

पदार्थ : हे (होतः) दाता और (अङ्गिरः) प्राण के सदृश प्रिय (अग्ने) विद्वन् ! (स्तुतः) प्रशंसित (स्तवानः) प्रशंसा करते हुए (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (विभ्वासहम्) व्यापकों के अच्छे प्रकार सहनेवाले (रयिम्) धन को (आ, भर) धारण कीजिये तथा (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों और (स्तवसे) स्तुति करनेवाले के लिये (च) भी (नः) हम लोगों को [धारण कीजिये (उत) और (पृत्सु) संग्रामों में] (वृधे) वृद्धि के लिये (एधि) प्राप्त हूजिये ॥७॥

भावार्थ : विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्वानों की इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे भगवानो ! अर्थात् विद्यारूप ऐश्वर्य्ययुक्त महाशयो ! आप लोग हम लोगों को ब्रह्मचर्य्य करा और उत्तम शिक्षा तथा विद्या देके और संग्रामों को जीतकर हम लोगों की निरन्तर वृद्धि करिये ॥७॥ इस सूक्त में अग्निशब्दार्थ विद्वान् और विद्यार्थी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह दशवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥