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Rigveda / 5 / 12 / 5

सखा॑यस्ते॒ विषु॑णा अग्न ए॒ते शि॒वासः॒ सन्तो॒ अशि॑वा अभूवन्। अधू॑र्षत स्व॒यमे॒ते वचो॑भिर्ऋजूय॒ते वृ॑जि॒नानि॑ ब्रु॒वन्तः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 12 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सुतम्भर आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सखा॑यः। ते॒। विषु॑णाः। अ॒ग्ने॒। ए॒ते। शि॒वासः॑। सन्तः॑। अशि॑वाः। अ॒भू॒व॒न्। अधू॑र्षत। स्व॒यम्। ए॒ते। वचः॑ऽभिः। ऋ॒जु॒ऽय॒ते। वृ॒जि॒नानि॑। ब्रु॒वन्तः॑ ॥५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! जो (एते) ये (ते) आपके (विषुणाः) विद्या को व्याप्त (सखायः) मित्र हुए (शिवासः) मङ्गल अर्थात् अच्छे आचरण करते (सन्तः) हुए (अशिवाः) अमङ्गल आचरण करनेवाले (अभूवन्) होवें उनका आपके नौकर और आप (अधूर्षत) नाश करो और हे राजा के नौकरो ! जो (एते) ये (स्वयम्) अपने ही (वचोभिः) वचनों से (वृजिनानि) धनों और बलों का (ब्रुवन्तः) उपदेश देते हुए (ऋजूयते) सरल होते हैं, उनका निरन्तर पालन करो ॥५॥

भावार्थ : मनुष्यों को यह योग्यता है कि जो मित्रजन शत्रु होवें, वे निरादर करने योग्य हैं और जो शत्रु मित्र होवें, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥