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Rigveda / 5 / 15 / 2

ऋ॒तेन॑ ऋ॒तं ध॒रुणं॑ धारयन्त य॒ज्ञस्य॑ शा॒के प॑र॒मे व्यो॑मन्। दि॒वो धर्म॑न्ध॒रुणे॑ से॒दुषो॒ नॄञ्जा॒तैरजा॑ताँ अ॒भि ये न॑न॒क्षुः ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 15 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : धरुण आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ऋ॒तेन॑। ऋ॒तम्। ध॒रुण॑म्। धा॒र॒य॒न्त॒। य॒ज्ञस्य॑। शा॒के। प॒र॒मे। विऽओ॑मन्। दि॒वः। धर्म॑न्। ध॒रुणे॑। से॒दुषः॑। नॄन्। जा॒तैः। अजा॑तान्। अ॒भि। ये। न॒न॒क्षुः ॥२॥

पदार्थ : (ये) जो (ऋतेन) सत्य वा परमात्मा से (ऋतम्) सत्य कारणादिक (धरुणम्) सब के धारण करनेवाले को (यज्ञस्य) सम्पूर्ण व्यवहार के (शाके) सामर्थ्य के निमित्त (परमे) उत्तम (व्योमन्) व्यापक (दिवः) सूर्य्य आदि से (धर्मन्) धर्म (धरुणे) और धारण करनेवाले में (जातैः) उत्पन्न हुए पदार्थों से (अजातान्) न उत्पन्न हुए (सेदुषः) ज्ञानवान् (नॄन्) मनुष्यों को (अभि, ननक्षुः) प्राप्त होते हैं, वे सत्यविद्या को (धारयन्त) धारण करें ॥२॥

भावार्थ : वे ही मनुष्य विद्वान् हैं, जो पूर्व और आगे वर्त्तमान विद्वानों को मिलकर परमेश्वर, प्रकृति और जीव के कार्य्य की विद्या को जानते हैं ॥२॥