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Rigveda / 5 / 16 / 5

नू न॒ एहि॒ वार्य॒मग्ने॑ गृणा॒न आ भ॑र। ये व॒यं ये च॑ सू॒रयः॑ स्व॒स्ति धाम॑हे॒ सचो॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 16 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : पुरुरात्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। नः॒। आ। इ॒हि॒। वार्य॑म्। अग्ने॑। गृ॒णा॒नः। आ। भ॒र॒। ये। व॒यम्। ये। च॒। सू॒रयः॑। स्व॒स्ति। धाम॑हे। सचा॑। उ॒त। ए॒धि॒। पृ॒त्ऽसु। नः॒। वृधे ॥५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! (ये) जो (सूरयः) विद्वान् (ये, च) और जो (वयम्) हम लोग (स्वस्ति) सुख को (धामहे) धारण करते हैं उनसे (सचा) सम्बद्ध आप (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य की (नू) शीघ्र और (गृणानः) विद्वानों के गुणों की स्तुति करते हुए (नः) हम लोगों को (आ, इहि) सब प्रकार से प्राप्त हूजिये (उत) और सुख की (आ, भर) सब प्रकार पुष्टि कीजिये तथा (पृत्सु) संग्रामों में (नः) हम लागों की (वृधे) वृद्धि के लिये (एधि) प्राप्त हूजिये ॥५॥

भावार्थ : जो मनुष्यों के लिये निरन्तर सुख देते हैं, उनके साथ मनुष्य सदा उन्नति करें ॥५॥ इस सूक्त में बिजुली का विषय संग्रामविजय और राज्यैश्वर्य के वर्द्धन का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सोलहवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥