Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 17 / 2

अस्य॒ हि स्वय॑शस्तर आ॒सा वि॑धर्म॒न्मन्य॑से। तं नाकं॑ चि॒त्रशो॑चिषं म॒न्द्रं प॒रो म॑नी॒षया॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 17 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पुरुरात्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब विद्वद्विषय को मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अस्य॑। हि। स्वय॑शःतरः। आ॒सा। वि॒ऽध॒र्म॒न्। मन्य॑से। तम्। नाक॑म्। चि॒त्रऽशो॑चिषम्। म॒न्द्रम्। प॒रः। म॒नी॒षया॑ ॥२॥

पदार्थ : हे (विधर्मन्) विशेष धर्म के अनुगामी ! जो (हि) निश्चय (अस्य) इसके सम्बन्ध में (स्वयशस्तरः) अत्यन्त अपना यश जिसका ऐसा पुरुष (आसा) मुख वा आसन से वर्त्तमान है और (परः) श्रेष्ठ हुए (मनीषया) बुद्धि से (तम्) उस (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले और (चित्रशोचिषम्) अद्भुत प्रकाशयुक्त (नाकम्) दुःख से रहित को आप (मन्यसे) जानते हो, उसका मैं आदर करता हूँ ॥२॥

भावार्थ : हे विद्वन् ! आप सदा ही धर्म्मयुक्त यश को बढ़ानेवाले कर्म्म को करें, जिससे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें ॥२॥