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Rigveda / 5 / 19 / 5

क्रीळ॑न्नो रश्म॒ आ भु॑वः॒ सं भस्म॑ना वा॒युना॒ वेवि॑दानः। ता अ॑स्य सन्धृ॒षजो॒ न ति॒ग्माः सुसं॑शिता व॒क्ष्यो॑ वक्षणे॒स्थाः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 19 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वव्रिरात्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : क्रीळ॑न्। नः॒। र॒श्मे॒। आ। भु॒वः॒। सम्। भस्म॑ना। वा॒युना॑। वेवि॑दानः। ताः। अ॒स्य॒। स॒न्। धृ॒षजः॑। न। ति॒ग्माः। सुऽसं॑शिताः। व॒क्ष्यः॑। व॒क्ष॒णे॒ऽस्थाः ॥५॥

पदार्थ : हे (रश्मे) किरणों के सदृश वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे बिजुलीरूप अग्नि (भस्मना) भस्म और (वायुना) पवन से (वेविदानः) जनाता अर्थात् अपने को प्रकट करता हुआ (ताः) उन (अस्य) इसकी (धृषजः) धृष्टता से उत्पन्न हुओं के (न) सदृश (तिग्माः) तीव्र (सुसंशिताः) उत्तम प्रकार प्रशंसित (वक्ष्यः) ले चलनेवाली और (वक्षणेस्थाः) वाहन में स्थिर ऐसी लपटों को धारण करता (सन्) हुआ सुख की (सम्) संभावना कराता है, वैसे (क्रीळन्) क्रीड़ा करते हुए आप (नः) हम लोगों के सुखकारी (आ, भुवः) हूजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे विद्वानो ! जैसे सूर्य की किरणें सर्वत्र फैली हुई सब को सुख देती हैं, वैसे ही सब स्थानों में भ्रमण तथा उपदेश करते हुए आप सब को आनन्द दीजिये ॥५॥ इस सूक्त में विद्वानों के सिद्ध करने योग्य उपदेश विषय का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह उन्नीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥