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Rigveda / 5 / 22 / 4

अग्ने॑ चिकि॒द्ध्य१॒॑स्य न॑ इ॒दं वचः॑ सहस्य। तं त्वा॑ सुशिप्र दम्पते॒ स्तोमै॑र्वर्ध॒न्त्यत्र॑यो गी॒र्भिः शु॑म्भ॒न्त्यत्र॑यः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 22 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विश्वसामा आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अग्ने॑। चि॒कि॒द्धि। अ॒स्य। नः॒। इ॒दम्। वचः॑। स॒ह॒स्य॒। तम्। त्वा। सु॒ऽशि॒प्र॒। द॒म्ऽप॒ते॒। स्तोमैः॑। व॒र्ध॒न्ति॒। अत्र॑यः। गीः॒ऽभिः। शु॒म्भ॒न्ति॒। अत्र॑यः ॥४॥

पदार्थ : हे (सहस्य) बल में श्रेष्ठ (सुशिप्र) सुन्दर ठुड्डी और नासिकावाले (दम्पते) स्त्री और पुरुष (अग्ने) विद्वन् ! आप जैसे (अत्रयः) तीन प्रकार के दुःखों से रहित जन (स्तोमैः) प्रशंसित व्यवहारों से (वर्धन्ति) वृद्धि को प्राप्त होते हैं और जैसे (अत्रयः) काम, क्रोध, और लोभ इन तीन दोषों से रहित जन (गीर्भिः) वाणियों से (शुम्भन्ति) पवित्र करते हैं, वैसे (नः) हम लोगों के (इदम्) इस (वचः) वचन को और (अस्य) इसके वचन को (चिकिद्धि) जानिये (तम्) उन (त्वा) आपका हम लोग सत्कार करें ॥४॥

भावार्थ : जैसे पुरुषार्थी मनुष्य सबकी वृद्धि करते हैं और उपदेशक जन सब जनों को पवित्र करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य आचरण करें ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बाईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥