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Rigveda / 5 / 25 / 6

अ॒ग्निर्द॑दाति॒ सत्प॑तिं सा॒साह॒ यो यु॒धा नृभिः॑। अ॒ग्निरत्यं॑ रघु॒ष्यदं॒ जेता॑र॒मप॑राजितम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 25 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निः। द॒दा॒ति॒। सत्ऽप॑तिम्। स॒साह॑। यः। यु॒धा। नृऽभिः॑। अ॒ग्निः। अत्य॑म्। र॒घु॒ऽस्यद॑म्। जेता॑रम्। अप॑राऽजितम् ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! वह (अग्निः) परमेश्वर वा विद्वान् (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करनेवाले को (ददाति) देता है (यः) जो (अग्निः) अग्नि (युधा) युद्ध करती हुई सेना और (नृभिः) नायक अर्थात् अग्रणी मनुष्यों से (रघुष्यदम्) लघुगमनवान् (जेतारम्) जीतने और (अपराजितम्) नहीं हारनेवाले राजा को (अत्यम्) मार्ग को व्याप्त होते घोड़े को जैसे वैसे (सासाह) सहता है ॥६॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर धर्मिष्ठ जनों के लिये धर्म्मात्मा राजा को देता है और जैसे उत्तम सेना विद्वान् शूरवीर और धर्म्मात्मा सेनाध्यक्ष को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीतती है, वैसे ही वह सब लोगों को आदर करने योग्य है ॥६॥