Rigveda / 5 / 27 / 5
यस्य॑ मा परु॒षाः श॒तमु॑द्ध॒र्षय॑न्त्यु॒क्षणः॑। अश्व॑मेधस्य॒ दानाः॒ सोमा॑इव॒ त्र्या॑शिरः ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 27 | Mantra No : 5
In English:
Seer : tryaruNastraivRRiShNastrasadasyushcha paurukutsa ashvamedhashcha bhaarato.avirvaa | Devta : agniH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yasya maa paruShaaH shatamuddharShayantyukShaNaH. ashvamedhasya daanaaH somaaiva tryaashiraH .5.
Component Words : yasya. maa. paruShaaH. shatam. ut.aharShayanti. ukShaNaH. ashva.amedhasya. daanaaH. somaaH.aiva. tri.aaashiraH .5.
In Hindi:
ऋषि : त्र्यरुणस्त्रैवृष्णस्त्रसदस्युश्च पौरुकुत्स अश्वमेधश्च भारतोऽविर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यस्य॑। मा॒। प॒रु॒षाः। श॒तम्। उ॒त्ऽह॒र्षय॑न्ति। उ॒क्षणः॑। अश्व॑ऽमेधस्य। दानाः॑। सोमाः॑ऽइव। त्रिऽआ॑शिरः ॥५॥
पदार्थ : (यस्य) जिस (अश्वमेधस्य) चक्रवर्त्तिराज्यपालन की विद्या की (शतम्) असङ्ख्य (परुषाः) कठोर (उक्षणः) मधुर उपदेशों से सींचती और (सोमाइव) सोमलतादिकों के सदृश (दानाः) देती हुई (त्र्याशिरः) जीव, अग्नि और पवनों से भोगी गईं (मा) मुझ को (उद्धर्षयन्ति) उत्साहित करती हैं, वे वाणियाँ मुझ से सहने योग्य हैं ॥५॥
भावार्थ : जो विद्या की इच्छा करें, वे सबकी मर्म्म भेदनेवाली वाणियों को सहें और चन्द्रमा के सदृश शान्त होके विद्या और विनय को ग्रहण करें ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्र्यरुणस्त्रैवृष्णस्त्रसदस्युश्च पौरुकुत्स अश्वमेधश्च भारतोऽविर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : यस्य॑। मा॒। प॒रु॒षाः। श॒तम्। उ॒त्ऽह॒र्षय॑न्ति। उ॒क्षणः॑। अश्व॑ऽमेधस्य। दानाः॑। सोमाः॑ऽइव। त्रिऽआ॑शिरः ॥५॥
पदार्थ : (यस्य) (मा) माम् (परुषाः) कठोराः (शतम्) असङ्ख्याः (उद्धर्षयन्ति) उत्साहयन्ति (उक्षणः) मधुरैरुपदेशैः सेचमानाः (अश्वमेधस्य) चक्रवर्तिराज्यपालनस्य विद्यायाः (दानाः) ददानाः (सोमाइव) सोमलतादय इव (त्र्याशिरः) यास्त्रिभिर्जीवाग्निवायुभिरश्यन्ते भुज्यन्ते ताः ॥५॥
अन्वय : यस्याश्वमेधस्य शतं परुषा उक्षणः सोमाइव दानास्त्र्याशिरो मा मामुद्धर्षयन्ति ता वाचो मया सोढव्याः ॥५॥
भावार्थ : ये विद्यामिच्छेयुस्ते सर्वेषां मर्मच्छिदो वाचः सहन्ताम्। चन्द्रवच्छान्ता भूत्वा विद्याविनयौ गृह्णन्तु ॥५॥