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Rigveda / 5 / 29 / 3

उ॒त ब्र॑ह्माणो मरुतो मे अ॒स्येन्द्रः॒ सोम॑स्य॒ सुषु॑तस्य पेयाः। तद्धि ह॒व्यं मनु॑षे॒ गा अवि॑न्द॒दह॒न्नहिं॑ पपि॒वाँ इन्द्रो॑ अस्य ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 29 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गौरिवीतिः शाक्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। ब्र॒ह्मा॒णः॒। म॒रु॒तः॒। मे॒। अ॒स्य॒। इन्द्रः॑। सोम॑स्य। सुऽसु॑तस्य। पे॒याः॒। तत्। हि। ह॒व्यम्। मनु॑षे। गाः। अवि॑न्दत्। अह॑न्। अहि॑म्। प॒पि॒ऽवान्। इन्द्रः॑। अ॒स्य॒ ॥३॥

पदार्थ : जिस प्रकार (इन्द्रः) सूर्य्य रस को पीता है, वैसे हे राजन् (इन्द्रः) प्रकाशमान ! आप (मे) मेरे (अस्य) और इसके भी (तत्, हि) उसी (सुषुतस्य) अच्छे प्रकार श्रेष्ठ बनाये (सोमस्य) ऐश्वर्य्यकारक पदार्थ के (हव्यम्) खाने योग्य भाग को (पेया) पीजिये जिससे (मनुषे) मनुष्यमात्र के लिये आप (गाः) गौ वा उत्तम वाणियों को (अविन्दत्) प्राप्त हों और जैसे (पपिवान्) भूमिस्थजलादि को पान करनेवाला सूर्य्य (अहिम्) मेघ का (अहन्) नाश करता है, वैसे आप (अस्य) इस राज्य के पालन को करिये (उत) इसी प्रकार हे (ब्रह्माणः) चार वेदों के जाननेवाले (मरुतः) मनुष्यो ! तुम लोग भी आचरण करो ॥३॥

भावार्थ : जो मनुष्य सब वेदों को पढ़कर नहीं खाने और नहीं पीने योग्य वस्तु का वर्ज्जन करके न्यायाधीश के सदृश न्याय और सूर्य्य के सदृश सत्य और असत्य का प्रकाश करते हैं, वे महाशय होते हैं ॥३॥