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Rigveda / 5 / 30 / 5

प॒रो यत्त्वं प॑र॒म आ॒जनि॑ष्ठाः परा॒वति॒ श्रुत्यं॒ नाम॒ बिभ्र॑त्। अत॑श्चि॒दिन्द्रा॑दभयन्त दे॒वा विश्वा॑ अ॒पो अ॑जयद्दा॒सप॑त्नीः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 30 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : बभ्रु रात्रेयः | देवता : इन्द्र ऋणञ्चयश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प॒रः। यत्। त्वम्। प॒र॒मः। आ॒ऽजनि॑ष्ठाः। प॒रा॒ऽवति॑। श्रुत्य॑म्। नाम॑। बिभ्र॑त्। अतः॑। चि॒त्। इन्द्रा॑त्। अ॒भ॒य॒न्त॒। दे॒वाः। विश्वाः॑। अ॒पः। अ॒ज॒य॒त्। दा॒सऽप॑त्नीः ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (यत्) जो (त्वम्) आप (परः) उत्तम (परमः) अत्यन्त श्रेष्ठ (श्रुत्यम्) श्रवण में उत्पन्न (नाम) संज्ञा को (बिभ्रत्) धारण करते हुए (आजनिष्ठाः) सब प्रकार से प्रकट होते हो, वह जैसे (परावति) दूर देश में स्थित सूर्य्य (विश्वाः) सम्पूर्ण (दासपत्नीः) जल का देनेवाला मेघ जिनका पालनकर्त्ता ऐसे (अपः) जलों को (अजयत्) जीतता है और जैसे (देवाः) विद्वान् जन (इन्द्रात्) बिजुली से (अभयन्त) नहीं डरते हैं, वैसे वर्त्तमान होने पर (अतः) इससे (चित्) भी सुख की वृद्धि करिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे दूरस्थित भी सूर्य्य अपने प्रकाश से प्रसिद्ध होता है, वैसे ही दूर वर्त्तमान भी यथार्थवक्ता जन प्रकाशित यशवाले होते हैं ॥५॥