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Rigveda / 5 / 31 / 2

आ प्र द्र॑व हरिवो॒ मा वि वे॑नः॒ पिश॑ङ्गराते अ॒भि नः॑ सचस्व। न॒हि त्वदि॑न्द्र॒ वस्यो॑ अ॒न्यदस्त्य॑मे॒नाँश्चि॒ज्जनि॑वतश्चकर्थ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 31 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : बभ्रु रात्रेयः | देवता : इन्द्र ऋणञ्चयश्च | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। प्र। द्र॒व॒। ह॒रि॒ऽवः॒। मा। वि॒। वे॒नः॒। पिश॑ङ्गऽराते। अ॒भि। नः॒। स॒च॒स्व॒। न॒हि। त्वत्। इ॒न्द्र॒। वस्यः॑। अ॒न्यत्। अस्ति॑। अ॒मे॒नान्। चि॒त्। जनि॑ऽवतः। च॒क॒र्थ॒ ॥२॥

पदार्थ : हे (हरिवः) श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त (पिशङ्गराते) सुवर्ण आदि के और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! आप (मा, वि, वेनः) कामना मत करें अर्थात् कामी न हों और (अमेनान्) नहीं विद्यमान हैं, प्रक्षेप करनेवाली स्त्रियाँ जिनकी उनको (चित्) उन्हीं (जनिवतः) जन्मवाले (चकर्थ) करें और (नः) हम लोगों का (अभि, सचस्व) सब ओर से सम्बन्ध करें और शत्रु के विजय के लिये (प्र, आ, द्रव) अच्छे प्रकार दौड़े जिससे (त्वत्) आपसे (वस्यः) अत्यन्त वसनेवाला (अन्यत्) दूसरा (नहि) नहीं (अस्ति) है, वह आप हम लोगों को सुख से सम्बन्ध कीजिये ॥२॥

भावार्थ : जो अतिकालपर्य्यन्त जीवने, बल बढ़ाने, राज्य करने और वृद्धि करने के लिये यत्न करता है, वही कृतकृत्य होता है ॥२॥