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Rigveda / 5 / 31 / 10

वात॑स्य यु॒क्तान्त्सु॒युज॑श्चि॒दश्वा॑न्क॒विश्चि॑दे॒षो अ॑जगन्नव॒स्युः। विश्वे॑ ते॒ अत्र॑ म॒रुतः॒ सखा॑य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ तवि॑षीमवर्धन् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 31 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : इन्द्रः, इन्द्र कुत्सो वा, इन्द्र उशना वा | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वात॑स्य। यु॒क्तान्। सु॒ऽयुजः॑। चि॒त्। अश्वा॑न्। क॒विः। चि॒त्। ए॒षः। अ॒ज॒ग॒न्। अ॒व॒स्युः। विश्वे॑। ते॒। अत्र॑। म॒रुतः॑। सखा॑यः। इन्द्र॑। ब्रह्मा॑णि। तवि॑षीम्। अ॒व॒र्ध॒न् ॥१०॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विद्वन् ! जो (ते) आपके (अत्र) इस शिल्पविद्या के जाननेरूप कार्य्य में (सखायः) मित्र (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करनेवाले विद्वान् जन (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों की और (तविषीम्) सेना की (अवर्धन्) वृद्धि करते हैं और (वातस्य) वायु के वेग से (युक्तान्) युक्त हुए (सुयुजः) उत्तम प्रकार पदार्थों के मेल करनेवाले (चित्) निश्चित (अश्वान्) शीघ्रगामी अर्थात् तीव्र वेगयुक्त अग्नि आदि पदार्थों को (अजगन्) चलावें उनको (एषः) यह वर्त्तमान (अवस्युः) अपने को रक्षण की इच्छा रखनेवाले (कविः, चित्) निश्चित बुद्धिमान् आप निरन्तर सत्कार करें ॥१०॥

भावार्थ : हे ऐश्वर्य्य की इच्छा रखनेवाले पुरुष ! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से विचित्र आश्चर्य्यजनक वाहन आदि कार्य्यों की सिद्धि कर सकते हैं, उनके साथ मित्रता करके और उनसे विद्या को प्राप्त हो अभीष्ट कार्य्यों को सिद्धि करते हुए आप अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें ॥१०॥