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Rigveda / 5 / 33 / 5

व॒यं ते त॑ इन्द्र॒ ये च॒ नरः॒ शर्धो॑ जज्ञा॒ना या॒ताश्च॒ रथाः॑। आस्माञ्ज॑गम्यादहिशुष्म॒ सत्वा॒ भगो॒ न हव्यः॑ प्रभृ॒थेषु॒ चारुः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 33 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : संवरणः प्राजापत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : व॒यम्। ते। ते॒। इ॒न्द्र॒। ये। च॒। नरः॑। शर्धः॑। ज॒ज्ञा॒नाः। या॒ताः। च॒। रथाः॑। आ। अ॒स्मान्। ज॒ग॒म्या॒त्। अ॒हि॒ऽशु॒ष्म॒। सत्वा॑। भगः॑। न। हव्यः॑। प्र॒ऽभृ॒थेषु॑। चारुः॑ ॥५॥

पदार्थ : हे (अहिशुष्म) मेघ को सुखानेवाले सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (इन्द्र) राजन् ! (ये) जो (ते) आपके (शर्धः) बल और (जज्ञानाः) उत्पन्न तथा (याताः) प्राप्त हुए (नरः) नायक (रथाः, च) और वाहन आदि हैं (ते) वे (अस्मान्) हम लोगों को प्राप्त होवें और जो (भगः) ऐश्वर्य्य के योग के (न) सदृश (प्रभृथेषु) अत्यन्त धारण करने योग्यों में (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (चारुः) सुन्दर (सत्वा) स्थिर होनेवाले आप हम लोगों को (आ, जगम्यात्) यथावत् प्राप्त होवें, उन आप को (वयम्) हम लोग (च) भी प्राप्त होवें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् ! जब हम लोग आपके और आप हम लोगों के मित्र होवें, तभी हम लोगों का ऐश्वर्य्य बड़े और जैसे ऐश्वर्य्य सब का प्रिय है, वैसे ही धर्म्म, प्रिय [=प्रिय धर्म] सदा रक्षा करने योग्य है ॥५॥