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Rigveda / 5 / 34 / 1

अजा॑तशत्रुम॒जरा॒ स्व॑र्व॒त्यनु॑ स्व॒धामि॑ता द॒स्ममी॑यते। सु॒नोत॑न॒ पच॑त॒ ब्रह्म॑वाहसे पुरुष्टु॒ताय॑ प्रत॒रं द॑धातन ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 34 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : संवरणः प्राजापत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब नव ऋचावाले चौंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रगुणयुक्त स्त्री-पुरुष का वर्णन करते हैं ॥

पदपाठ : अजा॑तऽशत्रुम्। अ॒जरा॑। स्वः॑ऽवती। अनु॑। स्व॒धा। अमि॑ता। द॒स्मम्। ई॒य॒ते॒। सु॒नोत॑न। पच॑त। ब्रह्म॑ऽवाहसे। पु॒रु॒ऽस्तु॒ताय॑। प्र॒ऽत॒रम्। द॒धा॒त॒न॒ ॥१॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (स्वर्वती) सुखवाली (अमिता) अतुल उत्तम गुणों से युक्त (स्वधा) धन को धारण करनेवाली (अजरा) वृद्धावस्था से रहित युवती स्त्री जिस (अजातशत्रुम्) शत्रुओं से रहित (दस्मम्) दुष्टों के नाश करनेवाले जन को (अनु, ईयते) अनुकूला से प्राप्त होती है, उस (पुरुष्टुताय) बहुतों से प्रशंसा किये गये (ब्रह्मवाहसे) धन प्राप्त करानेवाले के लिये (प्रतरम्) अच्छे प्रकार पार होते हैं, दुःख के जिससे उसको (सुनोतन) उत्पन्न करो और उत्तम अन्न का (पचत) पाक करो और धन आदि को (दधातन) धारण करो ॥१॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो वैररहित अत्यन्त उत्तम गुणों से युक्त और सब का हितकारी पुरुष अथवा इस प्रकार की स्त्री हो, उन दोनों का निरन्तर सत्कार करना योग्य है ॥१॥