Rigveda / 5 / 35 / 7
अ॒स्माक॑मिन्द्र दु॒ष्टरं॑ पुरो॒यावा॑नमा॒जिषु॑। स॒यावा॑नं॒ धने॑धने वाज॒यन्त॑मवा॒ रथ॑म् ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 35 | Mantra No : 7
In English:
Seer : prabhuuvasuraa~NgirasaH | Devta : indra: | Metre : svaraaDuShnik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asmaakamindra duShTara.m puroyaavaanamaajiShu. sayaavaana.m dhanedhane vaajayantamavaa ratham .7.
Component Words : asmaakam. indra. dustaram. puraH.ayaavaanam. aajiShu. sa.ayaavaanam. dhane.adhane. vaaja.ayantam. ava. ratham .7.
In Hindi:
ऋषि : प्रभूवसुराङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः
विषय : फिर प्रजाविषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : अ॒स्माक॑म्। इ॒न्द्र॒। दु॒स्तर॑म्। पु॒रः॒ऽयावा॑नम्। आ॒जिषु॑। स॒ऽयावा॑नम्। धने॑ऽधने। वाज॒ऽयन्त॑म्। अ॒व॒। रथ॑म् ॥७॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् ! आप (अस्माकम्) हम लोगों के (दुष्टरम्) शत्रुओं से दुःख से पार होने योग्य (पुरोयावानम्) नगर को चलते हुए (आजिषु) संग्रामों में (धनेधने) धन-धन में (सयावानम्) सेना आदि के साथ चलते हुए (वाजयन्तम्) किया अन्वेक्षण जिसका ऐसे (रथम्) सुन्दर वाहन की (अवा) रक्षा करो ॥७॥
भावार्थ : हे राजन् ! जो आप लोग हम लोगों के नगर और राज्य की यथावत् रक्षा करने को समर्थ होवें तो हम लोगों के राजा होवें ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रभूवसुराङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः
विषय : पुनः प्रजाविषयमाह ॥
पदपाठ : अ॒स्माक॑म्। इ॒न्द्र॒। दु॒स्तर॑म्। पु॒रः॒ऽयावा॑नम्। आ॒जिषु॑। स॒ऽयावा॑नम्। धने॑ऽधने। वाज॒ऽयन्त॑म्। अ॒व॒। रथ॑म् ॥७॥
पदार्थ : (अस्माकम्) (इन्द्र) राजन् (दुष्टरम्) शत्रुभिर्दुःखेन तरितुं योग्यम् (पुरोयावानम्) नगरम् यान्तम् (आजिषु) सङ्ग्रामेषु (सयावानम्) सेनादिना सह गच्छन्तम् (धनेधने) (वाजयन्तम्) कृताऽन्वेक्षणम् (अवा) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (रथम्) रमणीयं यानम् ॥७॥
अन्वय : हे इन्द्र ! त्वमस्माकं दुष्टरं पुरोयावानमाजिषु धनेधने सयावानं वाजयन्तं रथञ्चाऽवा ॥७॥
भावार्थ : हे राजन् ! यदि त्वमस्माकं पुरं राष्ट्रं च यथावद्रक्षितुं शक्नुयास्तर्ह्यस्माकं राजा भव ॥