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Rigveda / 5 / 37 / 3

व॒धूरि॒यं पति॑मि॒च्छन्त्ये॑ति॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ महि॑षीमिषि॒राम्। आस्य॑ श्रवस्या॒द्रथ॒ आ च॑ घोषात्पु॒रू स॒हस्रा॒ परि॑ वर्तयाते ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 37 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब युवावस्थाविवाहविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : व॒धूः। इ॒यम्। पति॑म्। इ॒च्छन्ती॑। ए॒ति॒। यः। ई॒म्। वहा॑ते। महि॑षीम्। इ॒षि॒राम्। आ। अ॒स्य॒। श्र॒व॒स्या॒त्। रथः॑। आ। च॒। घो॒षा॒त्। पु॒रु। स॒हस्रा॑। परि॑। व॒र्त॒या॒ते॒ ॥३॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! जैसे (इयम्) यह (पतिम्) पति की (इच्छन्ती) इच्छा करती हुई (वधूः) स्त्री प्रिय स्वामी को (एति) प्राप्त होती है और (यः) जो स्त्री को प्राप्त होनेवाला प्रिय (इषिराम्) प्राप्त होती हुई (महिषीम्) बहुत श्रेष्ठ गुणवाली स्त्री को प्राप्त होता है और जैसे वे दोनों सम्पूर्ण गृहकृत्य को (वहाते) चलावें वैसे (ईम्) जल वा सम्पूर्ण पदार्थों को अग्नि से चलाया गया (रथः) वाहन चलाता है वह (अस्य) इसके (आ, श्रवस्यात्) आत्मा के श्रवण की इच्छा करनेवाले से (घोषात् च) और शब्दद्वारा से (पुरू) बहुतों और (सहस्रा) हजारों के (परि) सब ओर (आ, वर्त्तयाते) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे किया ब्रह्मचर्य्य जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष परस्पर पति और स्त्रीभाव की इच्छा करते हैं तथा परस्पर प्रसन्न प्रिय होकर संयुक्त हुए गृहाश्रम के व्यवहार को उत्तम रीति से पूर्ण करते हैं, वैसे ही जल और अग्नि संप्रयुक्त किये गये सम्पूर्ण व्यवहार को सिद्ध करते हैं और बहुत कोशों से भी मुहूर्त्तमात्र से वाहन आदि को शीघ्र पहुँचाते हैं, यह सब को जानना चाहिये ॥३॥