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Rigveda / 5 / 38 / 4

उ॒तो नो॑ अ॒स्य कस्य॑ चि॒द्दक्ष॑स्य॒ तव॑ वृत्रहन्। अ॒स्मभ्यं॑ नृ॒म्णमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ नृमणस्यसे ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 38 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒तो इति॑। नः॒। अ॒स्य। कस्य॑। चि॒त्। दक्ष॑स्य। तव॑। वृ॒त्र॒ऽह॒न्। अ॒स्मभ्य॑म्। नृ॒म्णम्। आ। भ॒र॒। अ॒स्मभ्य॑म्। नृ॒ऽम॒न॒स्य॒से॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (वृत्रहन्) जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करता है, उसके सदृश वर्तमान (तव) आपका और (नः) हम लोगों के (उतो) भी (अस्य) इसके (कस्य) किसके (चित्) भी (दक्षस्य) बलसम्बन्धी (नृमणस्यसे) अपने धन की इच्छा करते हो वह आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (नृम्णम्) मनुष्य रमते हैं जिसमें उस धन का (आ, भर) धारण कीजिये और (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये अभय दीजिये ॥४॥

भावार्थ : वही श्रेष्ठ मनुष्यों में मुख्य हो, जो राज्य के रक्षण में तत्पर होकर वर्त्ताव करे ॥४॥