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Rigveda / 5 / 41 / 8

अ॒भि वो॑ अर्चे पो॒ष्याव॑तो॒ नॄन्वास्तो॒ष्पतिं॒ त्वष्टा॑रं॒ ररा॑णः। धन्या॑ स॒जोषा॑ धि॒षणा॒ नमो॑भि॒र्वन॒स्पतीँ॒रोष॑धी रा॒य एषे॑ ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 41 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। वः॒। अ॒र्चे॒। पो॒ष्याऽव॑तः। नॄन्। वास्तोः॑। पति॑म्। त्वष्टार॑म्। ररा॑णः। धन्या॑। स॒ऽजोषाः॑। धि॒षणा॑। नमः॑ऽभिः। वन॒स्पती॑न्। ओष॑धीः। रा॒यः। एषे॑ ॥८॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (धन्या) धन को प्राप्त हुई (सजोषाः) तुल्य प्रीति की सेवनेवाली (धिषणा) बुद्धि (नमोभिः) सत्कारों वा अन्न आदिकों से (वनस्पतीन्) अश्वत्थ आदि और (ओषधीः) यव सोमलतादिकों को तथा (रायः) धनों को (एषे) प्राप्त होने के लिये समर्थ होती है, वैसे (वास्तोः) निवास के स्थान के (पतिम्) पालनेवाले (त्वष्टारम्) तेजस्वीजन को (रराणः) दाता मैं (पोष्यावतः) बहुत पोषण करने योग्य पदार्थ जिनके विद्यमान उन (वः) आप (नॄन्) मनुष्यों का (अभि, अर्चे) प्रत्यक्ष सत्कार करता हूँ ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे तीव्र बुद्धि और विद्या से युक्त मनुष्य वैद्यक विद्या को जान कर मनुष्य आदिकों का पालन करते हैं, वैसे ही सब के हित की इच्छा करनेवाले मनुष्यों का सदा ही सत्कार करिये ॥८॥