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Rigveda / 1 / 33 / 14

आवः॒ कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्प्रावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम् । श॒फच्यु॑तो रे॒णुर्न॑क्षत॒ द्यामुच्छ्वै॑त्रे॒यो नृ॒षाह्या॑य तस्थौ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 33 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कृत्य का उपदेश किया है।

पदपाठ : आवः॑ । कुत्स॑म् । इ॒न्द्र॒ । यस्मि॑न् । चा॒कन् । प्र । आ॒वः॒ । युध्य॑न्तम् । वृ॒ष॒भम् । दश॑ऽद्युम् । श॒फऽच्यु॑तः । रे॒णुः । न॒क्ष॒त॒ । द्याम् । उत् । श्वै॒त्रे॒यः । नृ॒ऽसह्या॑य । त॒स्थौ॒॥

पदार्थ : हे इन्द्र सभापते ! जैसे सूर्यलोक (यस्मिन्) जिस युद्ध में (युध्यन्तम्) युद्ध करते हुए (वृषभम्) वृष्टि के करानेवाले (दशद्युम्) दशदिशाओं में प्रकाशमान मेघ के प्रति (कुत्सम्) वज्रमार के जगत् की (प्रावः) रक्षा करता है और (श्वैत्रेयः) भूमि का पुत्र मेघ (शफच्युतः) गौ आदि पशुओं के खुरों के चिन्हों में गिरी हुई (रेणुः) धूलि (द्याम्) प्रकाश युक्त लोक को (नक्षत) प्राप्त होती है उसको (नृसाह्याय) मनुष्यों के लिये (चाकन्) वह कान्तिवाला (उत्तस्थौ) उठता और सुखों को देता है वैसे सभा सहित आपको प्रजा के पालन में यत्न करना चाहिये ॥१४॥

भावार्थ : इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक अपनी किरणों से पृथिवी में मेघ को गिराकर सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है वैसे ही हे सभाध्यक्ष तूं भी सेना शिक्षा और शस्त्र बल से शत्रुओं को अस्त व्यस्त कर नीचे गिरा के प्रजा की रक्षा निरन्तर किया कर ॥१४॥