Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 42 / 5

दे॒वो भगः॑ सवि॒ता रा॒यो अंश॒ इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॑ सं॒जितो॒ धना॑नाम्। ऋ॒भु॒क्षा वाज॑ उ॒त वा॒ पुरं॑धि॒रव॑न्तु नो अ॒मृता॑सस्तु॒रासः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 42 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : दे॒वः। भगः॑। स॒वि॒ता। रा॒यः। अंशः॑। इन्द्रः॑। वृ॒त्रस्य॑। स॒म्ऽजितः॑। धना॑नाम्। ऋ॒भु॒क्षाः। वाजः॑। उ॒त। वा॒। पुर॑म्ऽधिः। अव॑न्तु। नः॒। अ॒मृता॑सः। तु॒रासः॑ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (देवः) दाता (भगः) ऐश्वर्य्य से सम्पन्न (सविता) प्रेरणा करनेवाला (रायः) धनों का (अंशः) विभाग तथा (वृत्रस्य) मेघ और (धनानाम्) धनों का (संजितः) उत्तम प्रकार जीतनेवाला (इन्द्रः) सूर्य्य (ऋभुक्षाः) बड़ा (वाजः) ज्ञानवान् (उत) भी (वा) वा (पुरन्धिः) बहुत बुद्धिमान् और (तुरासः) शीघ्र कार्य्य करनेवाले तथा (अमृतासः) अपने रूप में नहीं नाश होनेवाले (नः) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें, वैसे ये आप लोगों की भी रक्षा करें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अपने सदृश अन्यों के भी सुख-दुःख, हानि-लाभ, प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा को मानते हैं, वे ही प्रशंसा के योग्य होते हैं ॥५॥