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Rigveda / 5 / 42 / 7

उप॑ स्तुहि प्रथ॒मं र॑त्न॒धेयं॒ बृह॒स्पतिं॑ सनि॒तारं॒ धना॑नाम्। यः शंस॑ते स्तुव॒ते शंभ॑विष्ठः पुरू॒वसु॑रा॒गम॒ज्जोहु॑वानम् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 42 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वानों के उपदेशविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उप॑। स्तु॒हि॒। प्र॒थ॒मम्। र॒त्न॒ऽधेय॑म्। बृह॒स्पति॑म्। स॒नि॒तार॑म्। धना॑नाम्। यः। शंस॑ते। स्तु॒व॒ते। शम्ऽभ॑विष्ठः। पु॒रु॒ऽवसुः॑। आ॒ऽगम॑त्। जोहु॑वानम् ॥७॥

पदार्थ : हे विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त ! (यः) जो (पुरूवसुः) बहुत धनों से युक्त (शम्भविष्ठः) अत्यन्त सुखकारक जन (शंसते) प्रशंसा करनेवाले और (स्तुवते) स्तुति करनेवाले के लिये (प्रथमम्) पहिले (रत्नधेयम्) रत्न धरने योग्य जिससे उस (जोहुवानम्) पुकारे गये वा पुकारनेवाले के लिये (बृहस्पतिम्) बड़ों के पालन करने और (धनानाम्) धनों के (सनितारम्) उत्तम प्रकार विभाग करनेवाले को (आगमत्) प्राप्त हो, उसकी आप (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति करो ॥७॥

भावार्थ : वे ही जन प्रशंसा करने योग्य होते हैं, जो सब पदार्थ बाँट अर्थात् विभाग करके खाते हैं ॥७॥