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Rigveda / 1 / 34 / 1

त्रिश्चि॑न्नो अ॒द्या भ॑वतं नवेदसा वि॒भुर्वां॒ याम॑ उ॒त रा॒तिर॑श्विना । यु॒वोर्हि य॒न्त्रं हि॒म्येव॒ वास॑सोऽभ्यायं॒सेन्या॑ भवतं मनी॒षिभिः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 34 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब चौतीसवें सूक्त का आरंभ है। उसके पहिले मन्त्र में अश्वि के दृष्टान्त से कारीगरों के गुणों का उपदेश किया है।

पदपाठ : त्रिः । चि॒त् । नः॒ । अ॒द्य । भ॒व॒त॒म् । नवेदसा । वि॒ऽभुः । वा॒म् । यामः॑ । उ॒त । रा॒तिः । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वोः । हि । य॒न्त्रम् । हि॒म्याऽइ॑व । वास॑सः । अ॒भि॒ऽआ॒यं॒सेन्या॑ । भ॒व॒त॒म् । म॒नी॒षिऽभिः॑॥

पदार्थ : हे परस्पर उपकारक और मित्र (अभ्यायंसेन्या) साक्षात् कार्य्यसिद्धि के लिये मिले हुए (नवेदसा) सब विद्याओं के जाननेवाले (अश्विना) अपने प्रकाश से व्याप्त सूर्य्य चन्द्रमा के समान सब विद्याओं में व्यापी कारीगर लोगो ! आप (मनीषिभिः) सब विद्वानों के साथ #दिनों के साथ (हिम्याइव) शीतकाल की रात्रियों के समान (नः) हम लोगों के (अद्य) इस वर्त्तमान दिवस में शिल्पकार्य्य के साधक (भवतम्) हूजिये (हि) जिस कारण (युवोः) आपके सकाश से (यंत्रम्) कलायंत्र को सिद्ध कर यानसमूह को चलाया करें जिससे (नः) हम लोगों को (वाससः) रात्रि, दिन, के बीच (रातिः) वेगादि गुणों से दूर देश को प्राप्त होवे (उत) और (वाम्) आपके सकाश से (विभुः) सब मार्ग में चलनेवाला (यामः) रथ प्राप्त हुआ हम लोगों को देशान्तर को सुख से (त्रिः) तीन बार पहुंचावे इसलिये आपका सङ्ग हम लोग करते हैं ॥१॥ # [यह अर्थ संस्कृत पदार्थ में नहीं है। सं०]

भावार्थ : इस मंत्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये जैसे रात्रि वा दिन को क्रम से संगति होती है वैसे संगति करें जैसे विद्वान् लोग पृथिवी विकारों के यान कला कील और यन्त्रादिकों को रचकर उनके घुमाने और उसमें अग्न्यादि के संयोग से भूमि समुद्र वा आकाश में जाने आने के लिये यानों को सिद्ध करते हैं। वैसे ही मुझको भी विमानादि यान सिद्ध करने चाहिये। क्योंकि इस विद्या के विना किसी के दारिद्र्य का नाश वा लक्ष्मी की वृद्धि कभी नहीं हो सकती इससे विद्या में सब मनुष्यों को अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिये जैसे मनुष्य लोग हेमन्त ऋतु में वस्त्रों को अच्छे प्रकार धारण करते हैं वैसे ही सब प्रकार कील कला यंत्रादिकों से यानों को संयुक्त रखना चाहिये ॥१॥