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Rigveda / 5 / 45 / 4

सू॒क्तेभि॑र्वो॒ वचो॑भिर्दे॒वजु॑ष्टै॒रिन्द्रा॒ न्व१॒॑ग्नी अव॑से हु॒वध्यै॑। उ॒क्थेभि॒र्हि ष्मा॑ क॒वयः॑ सुय॒ज्ञा आ॒विवा॑सन्तो म॒रुतो॒ यज॑न्ति ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 45 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : सदापृण आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सु॒ऽउ॒क्तेभिः। वः॒। वचः॑ऽभिः। दे॒वऽजु॑ष्टैः। इन्द्रा॑। नु। अ॒ग्नी इति॑। अव॑से। हु॒वध्यै॑। उ॒क्थेभिः॑। हि। स्म॒। क॒वयः॑। सु॒ऽय॒ज्ञाः। आ॒ऽविवा॑सन्तः। म॒रुतः॑। यज॑न्ति ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (आविवासन्तः) सत्य का सब प्रकार से सेवन करते हुए (सुयज्ञाः) सुन्दर विद्या और धर्म के प्रचार करनेवाली क्रिया जिनकी ऐसे (कवयः) बुद्धिमान् विद्वान् (मरुतः) मनुष्य (सूक्तेभिः) जो उत्तम प्रकार कहे जायें उन (देवजुष्टैः) विद्वानों से सेवित और (उक्थेभिः) प्रशंसा करनेवाले (वचोभिः) उत्तम प्रकार शिक्षित वचनों से (हि) निश्चय से (इन्द्रा) बिजुली (अग्नी) और अग्नि को तथा (वः) आप लोगों को (अवसे) रक्षण आदि के लिये (हुवध्यै) ग्रहण करने को (नु) शीघ्र (यजन्ति) मिलते हैं, वैसे (स्मा) ही आप लोग भी इस प्रकार मिलो ॥४॥

भावार्थ : जो विद्वान् जन सब के लिये सुख, विद्या और विज्ञान का सेवन करते हुए अग्नि आदि की विद्या को सब के लिये देते हैं, वे ही उत्तम होते हैं ॥४॥