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Rigveda / 5 / 45 / 6

एता॒ धियं॑ कृ॒णवा॑मा सखा॒योऽप॒ या मा॒ताँ ऋ॑णु॒त व्र॒जं गोः। यया॒ मनु॑र्विशिशि॒प्रं जि॒गाय॒ यया॑ व॒णिग्व॒ङ्कुरापा॒ पुरी॑षम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 45 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सदापृण आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को उत्तम बुद्धि कैसे प्राप्त होनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। इ॒त॒। धिय॑म्। कृ॒णवा॑म। स॒खा॒यः। अप॑। या। मा॒ता। ऋ॒णु॒त। व्र॒जम्। गोः। यया॑। मनुः॑। वि॒शि॒ऽशि॒प्रम्। जि॒गाय॑। यया॑। व॒णिक्। व॒ङ्कुः। आप॑। पुरी॑षम् ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यया) जिससे (मनुः) मनुष्य (विशिशिप्रम्) सुन्दर ठुढ्ढी और नासिका जिसकी उसको (जिगाय) जीतता है (यया) जिससे (वङ्कुः) धन की इच्छा करनेवाला (वणिक्) व्यापारी वैश्य (पुरीषम्) पूर्ण करनेवाले जल को (आपा) प्राप्त होता है उस (धियम्) बुद्धि को (सखायः) मित्र होते हुए हम लोग (कृणवामा) करें और जैसे (या) जो (माता) माता के सदृश (गोः) किरण से (व्रजम्) मेघ को करता है और दुःख को (अप) दूर करता है, वैसे इसको आप लोग (ऋणुत) सिद्ध करिये और बुद्धि को (आ) सब प्रकार (इता) प्राप्त हूजिये ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्यों को योग्य है कि परस्पर में मित्र होकर बुद्धि को बढ़ाय औरों के लिये विशेष ज्ञान अच्छे प्रकार देवें, जैसे वैश्य धन को प्राप्त होकर बढ़ता है, वैसे उत्तम बुद्धि को पाकर बढ़े ॥६॥