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Rigveda / 5 / 45 / 10

आ सूर्यो॑ अरुहच्छु॒क्रमर्णोऽयु॑क्त॒ यद्ध॒रितो॑ वी॒तपृ॑ष्ठाः। उ॒द्ना न नाव॑मनयन्त॒ धीरा॑ आशृण्व॒तीरापो॑ अ॒र्वाग॑तिष्ठन् ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 45 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : सदापृण आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। सूर्यः॑। अ॒रु॒ह॒त्। शु॒क्रम्। अर्णः॑। अयु॑क्त। यत्। ह॒रितः॑। वीतऽपृ॑ष्ठाः। उ॒द्ना। न। नाव॑म्। अ॒न॒य॒न्त॒। धीराः॑। आ॒ऽशृ॒ण्व॒तीः। आपः॑। अ॒र्वाक्। अ॒ति॒ष्ठ॒न् ॥१०॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (सूर्य्यः) सूर्य्य (शुक्रम्) वीर्य का (आ, अरुहत्) आरोहण करता और (अर्णः) उदक का (अयुक्त) योग करता है और (वीतपृष्ठाः) व्याप्त हैं लोकान्तरों के पृष्ठ जिनसे वे (हरितः) जल आदि को हरनेवाले (धीराः) ध्यानवान् बुद्धिमान् जन (उद्ना) जल से (नावम्) नौका को (न) जैसे वैसे (अनयन्त) प्राप्त होते अर्थात् व्यवहार को पहुँचते हैं (अर्वाक्) पीछे (आशृण्वतीः) जो चारों ओर से सुन पड़ते हैं वह (आपः) प्राण (अतिष्ठन्) स्थित होते हैं, उस सब को आप लोग जानें ॥१०॥

भावार्थ : जो मनुष्य सूर्य्य और जल आदि की विद्याओं को जान के नौका आदि को चलावें, वे लक्ष्मीवान् होते हैं ॥१०॥