Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 46 / 2

अग्र॒ इन्द्र॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवाः॒ शर्धः॒ प्र य॑न्त॒ मारु॑तो॒त वि॑ष्णो। उ॒भा नास॑त्या रु॒द्रो अध॒ ग्नाः पू॒षा भगः॒ सर॑स्वती जुषन्त ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 46 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : सदापृण आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : मनुष्यों को विद्युदादि विद्या अवश्य स्वीकार करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अग्ने॑। इन्द्र॑। वरु॑ण। मित्र॑। देवाः॑। शर्धः॑। प्र। य॒न्त॒। मारु॑त। उ॒त। वि॒ष्णो॒ इति॑। उ॒भा। नास॑त्या। रु॒द्रः। अध॑। ग्नाः। पू॒षा। भगः॑। सर॑स्वती। जु॒ष॒न्त॒ ॥२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त (अग्ने) विद्वन् (वरुण) श्रेष्ठ (मित्र) मित्र (मारुत) मनुष्यों में विदित और (देवाः) विद्वानो ! आप (शर्धः) बल को (प्र, यन्त) प्राप्त होते हैं (उत) और हे (विष्णोः) व्यापनशील ! (उभा) दो (नासत्या) असत्य आचरण से रहित जन (रुद्रः) दुष्टों को भयंकर (भगः) ऐश्वर्य्यवान् (पूषा) पुष्टिकारक वायु (अध) इसके अनन्तर (सरस्वती) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी भी (ग्नाः) वाणियों का (जुषन्त) सेवन करें ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोगों को चाहिये कि विद्या, शरीर, बल और योग की वृद्धि करके अग्नि आदि विद्या को स्वीकार करें ॥२॥