Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 34 / 7

त्रिर्नो॑ अश्विना यज॒ता दि॒वेदि॑वे॒ परि॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीम॑शायतम् । ति॒स्रो ना॑सत्या रथ्या परा॒वत॑ आ॒त्मेव॒ वातः॒ स्वस॑राणि गच्छतम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 34 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : त्रिः । नः॒ । अ॒स्वि॒ना॒ । य॒ज॒ता । दि॒वेऽदि॑वे । परि॑ । त्रि॒ऽधातु॑ । पृ॒थि॒वीम् । अ॒शा॒य॒त॒म् । ति॒स्रः । ना॒स॒त्या॒ । र॒थ्या॒ । प॒रा॒ऽवतः॑ । आ॒त्माऽइ॑व । वातः॒ । स्वस॑राणि । ग॒च्छ॒त॒म्॥

पदार्थ : हे (नासत्या) असत्य व्यवहार रहित (यजता) मेल करने तथा (रथ्या) विमानादि यानों को प्राप्त करानेवाले (अश्विना) जल और अग्नि के समान कारीगर लोगो ! तुम दोनों (पृथिवी) भूमि वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर (त्रिः) तीन बार (पर्य्यशायतम्) शयन करो (आत्मेव्) जैसे जीवात्मा के समान (वातः) प्राण (स्वसराणि) अपने कार्य्यों में प्रवृत्त करनेवाले दिनों को नित्य-२ प्राप्त होते हैं वैसे (गच्छतम्) देशान्तरों को प्राप्त हुआ करो और जो (नः) हम लोगों के (त्रिधातु) सोना चांदी आदि धातुओं से बनाये हुए यान (परावतः) दूरस्थानों को (तिस्रः) ऊंची नीची और सम चाल चलते हुए मनुष्यादि प्राणियों को पहुंचाते हैं उनको कार्यसिद्धि के अर्थ हम लोगों के लिये बनाओ ॥७॥

भावार्थ : इस मंत्र में उपमालङ्कार है। संसारसुख की इच्छा करनेवाले पुरुष जैसे जीव अन्तरिक्ष आदि मार्गों से दूसरे शरीरों को शीघ्र प्राप्त होता और जैसे वायु शीघ्र चलता है वैसे ही पृथिव्यादि विकारों से कलायन्त्र युक्त यानों को रच और उनमें अग्नि जल आदि का अच्छे प्रकार प्रयोग करके चाहे हुए दूर देशों को शीघ्र पहुंचा करें इस काम के विना संसारसुख होने को योग्य नहीं है ॥७॥