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Rigveda / 5 / 48 / 3

आ ग्राव॑भिरह॒न्ये॑भिर॒क्तुभि॒र्वरि॑ष्ठं॒ वज्र॒मा जि॑घर्ति मा॒यिनि॑। श॒तं वा॒ यस्य॑ प्र॒चर॒न्त्स्वे दमे॑ संव॒र्तय॑न्तो॒ वि च॑ वर्तय॒न्नहा॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 48 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रतिभानुरात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर स्त्री-पुरुष कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। ग्राव॑ऽभिः। अ॒॒ह॒न्ये॑भिः। अ॒क्तु॒ऽभिः॑। वरि॑ष्ठम्। वज्र॑म्। आ। जि॒घ॒र्ति॒। मा॒यिनि॑। श॒तम्। वा॒। यस्य॑। प्र॒ऽचर॑न्। स्वे। दमे॑। स॒म्ऽव॒र्तय॑न्तः। वि। च॒। व॒र्त॒य॒न्। अहा॑ ॥३॥

पदार्थ : हे (मायिनि) प्रशंसित बुद्धि से युक्त ! जिससे आप (ग्रावभिः) मेघों (अहन्येभिः) दिनों और (अक्तुभिः) रात्रियों से (वरिष्ठम्) अति श्रेष्ठ (वज्रम्) शस्त्रविशेष को (आ, जिघर्त्ति) प्रदीप्त करती हो (शतम्, वा) अथवा सैकड़ों का दल (यस्य) जिसके (स्वे) अपने (दमे) गृह में (प्रचरन्) चलता और (अहा) दिनों को (आ, वर्तयन्) अच्छे प्रकार व्यतीत करता हुआ व्यवहार को प्रकाशित करता है (च) और जिसकी (संवर्त्तयन्तः) उत्तम प्रकार वर्त्तमान किरणें (वि) विशेष फैलती हैं, उसको तू विशेष करके जान ॥३॥

भावार्थ : जो स्त्री और पुरुष भयरहित हों तो सूर्य्य और बिजुली के सदृश दिन-रात्रि पुरुषार्थ को करके ऐश्वर्य्य से प्रकाशित हों ॥३॥