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Rigveda / 5 / 48 / 5

स जि॒ह्वया॒ चतु॑रनीक ऋञ्जते॒ चारु॒ वसा॑नो॒ वरु॑णो॒ यत॑न्न॒रिम्। न तस्य॑ विद्म पुरुष॒त्वता॑ व॒यं यतो॒ भगः॑ सवि॒ता दाति॒ वार्य॑म् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 48 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रतिभानुरात्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रशंसित सेना जिसकी ऐसा ही राजा जीतनेवाला होने को योग्य है ॥

पदपाठ : सः। जि॒ह्वया॑। चतुः॑ऽअनीकः। ऋ॒ञ्ज॒ते॒। चारु॑। वसा॑नः। वरु॑णः। यत॑न्। अ॒रिम्। न। तस्य॑। वि॒द्म॒। पु॒रु॒ष॒त्वता॑। व॒यम्। यतः॑। भगः॑। स॒वि॒ता। दाति॑। वार्य॑म् ॥५॥

पदार्थ : जो (वरुणः) श्रेष्ठ (चारु) सुन्दर वस्त्र को (वसानः) धारण करता हुआ (चतुरनीकः) चार प्रकार की सेनायें जिसकी यह (जिह्वया) वाणी से (अरिम्) शत्रु का (यतन्) यत्न करता हुआ (पुरुषत्वता) बहुत पुरुषार्थ के साथ (भगः) ऐश्वर्य्य से युक्त (सविता) सत्य में प्रेरणा करनेवाला (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य उपदेश को (दाति) देता है (सः) वह (ऋञ्जते) उत्तम प्रकार सिद्ध करता है (यतः) जिससे (वयम्) हम लोग (तस्य) उसके पुरुषार्थ के अन्त को (न) नहीं (विद्म) जानें ॥५॥

भावार्थ : जिसकी उत्तम सेना है, वही राजा प्रशंसित होता है ॥५॥ इस सूक्त में विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अड़तालीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥