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Rigveda / 5 / 49 / 5

प्र ये वसु॑भ्य॒ ईव॒दा नमो॒ दुर्ये मि॒त्रे वरु॑णे सू॒क्तवा॑चः। अवै॒त्वभ्वं॑ कृणु॒ता वरी॑यो दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॑सा मदेम ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 49 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रतिप्रभ आत्रेयः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्यों को क्या करके क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। ये। वसु॑ऽभ्यः। ईव॑त्। आ। नम॑। दुः। ये। मि॒त्रे। वरु॑णे। सू॒क्तऽवा॑चः। अव॑। ए॒तु॒। अभ्व॑म्। कृ॒णु॒त। वरी॑यः। दि॒वःपृ॑थि॒व्योः। अव॑सा। म॒दे॒म॒ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ये) जो (मित्रे) मित्र (वरुणे) उत्तम तिथि के निमित्त (ईवत्) गतिमान् तथा रक्षणवान् पदार्थ को (प्र, आ, दुः) उत्तम प्रकार देवें वा (ये) जो तुम लोग (वसुभ्यः) धनों के लिये (नमः) अन्न को (कृणुता) सिद्ध करो उनसे युक्त (सूक्तवाचः) उत्तम प्रशंसित वाणीवाले हम लोग (दिवः, पृथिव्योः) प्रकाश सूर्य्य और भूमि के मध्य में जिससे (वरीयः, अभ्वम्) अत्युत्तम धनादि तथा अत्यन्त (अव, एतु) प्राप्त हो उसकी (अवसा) रक्षा से (मदेम) आनन्दित हों ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! पुरुषार्थ से लक्ष्मी को और उससे अन्न आदि को इकट्ठा कर बड़े सुख को प्राप्त होकर सब का रक्षण करो ॥५॥ इस सूक्त में सूर्य और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह उनचासवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥